मानव कोन है

मनुष्य इस संसार में आता है, उसके अन्दर स्वाभाविक ही यह जानने की इच्छा पैदा होती है कि वो क्या है, कहाँ से आया है, कहाँ जाएगा? इसी तरह हर व्यक्ति जो किसी भी जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, देश का हो, वो भी यह जानने के लिए विवश है कि मेरी जाति, धर्म, सम्प्रदाय क्या है, कैसे बनी? अपने आप को जानने से पहले इन बातों का ज्ञान आवश्यक है. इन बातों के ज्ञान के लिए प्रकट रूप में पता लगता है कि मुझे माता-पिता ने उत्पन्न किया और मेरा यह नाम है, यह जाति है, यह धर्म है. तो यह माता पिता बताते हैं, तेरा क्या नाम है, तू हमारा लड़का-लड़की है, किस जाति का है.। इसी क्रम में मुझे भी जीवन के प्रारम्भिक समय में ये ख्यालात आते थे कि मैं कौन हूँ? माता-पिता ने जितना हो सका बता दिया. मेरा नाम रखा. अब जो भी इस नाम से मुझे पुकारता है, मुझे यकीन हो गया है कि मैं मुन्शीराम हूँ. जाति का अपने माता-पिता से, समाज के लागों से यकीन हो गया कि मैं मेघ जाति का हूँ. इसके बाद वास्तव में मनुष्य क्या है, यह गुरु बताता है. गुरु की दया से यह पता चला जाता है कि इन्सान शरीर है या मन है या आत्मा है या इससे परे भी कोई हमारा अपना आप है. उसको जान लेने के बाद अपने आप का पूरा विश्वास हो जाता है. इस विश्वास के हो जाने के बाद गुरु की दया, माता-पिता की दया शेष रह जाती है या इनके ऋण सिर पर रहते हैं. उसे चुकाना बहुत ज़रूरी समझा जाता है. माता-पिता ने तो यह संसार दिखाया, इस शरीर में उत्पन्न किया. अपने असली रूप को जानने के लिए शरीर में आना ज़रूरी है. अपने आप का पूर्ण ज्ञान तभी हो सकता है, जब इन्सानी चोला मिलता है जिसमें अपने आप को जानने की यह सारी व्यवस्था होती है.वो मालिक, परम तत्त्व आधार, जब मनुष्य के शरीर में आता है, तो उसकी दया से इन्सान स्वाभाविक ही उसकी तरफ खिंचा जाता है. जैसी किसी की इच्छा होती है, वैसा ही प्रकृति व्यवस्था प्रदान कर देती है इसलिए माता-पिता की भी दया है या उनका भी ऋण सिर पर होता है और उसे भी चुकाना ज़रूरी होता है. गुरु का ऋण उसकी आज्ञा मानने से, संसार के जीवों को यह बताने से कि तुम वास्तव में कौन हो, गुरु का ऋण चुकाया जा सकता है.
भगत बनें

भगत बनना क्या है? सबसे प्रेम रखने वाला ही भगत कहलाता है.

फिर आर्य बने. भद्र पुरुष बनना और दूसरों को भद्र समझना ही आर्य बनना है और इसके पश्चात्‌ अनुसूचित जातियों में इनका नाम भी आ गया. ध्यान रखा जाए कि अनुसूचित जाति अछूत नहीं होती, केवल आर्थिक रूप में पिछड़ी हुई जातियाँ अनुसूचित के नाम से पुकारी गईं. इस पुस्तक में यह भी सिद्ध किया गया है कि कोई जाति या समाज या व्यक्तित जन्म से नीच या अछूत नहीं होता. विचारों से कर्म बनते हैं. जिसके विचार गन्दे हैं वही कर्म का गन्दा होता है. सफाई या चमड़े के काम से कोई अछूत नहीं हो जाता. ये कर्म सेवा में आते है. आर्य समाज या वैदिक धर्म ने भी यही प्रचार किया था कि जन्म से कोई अछूत नहीं होता, बल्कि बुरे कर्म या बुरे विचार से होता है.शरीर का संबंध जाति, धर्म, पंथ और समुदाय से भी है. जब कोई दो या अधिक जातियों, धर्म, पंथ और सम्प्रदाय वालों से मिलता है, तो वो एक-दूसरे को किसी जाति, धर्म, पंथ और समुदाय के नाम से पुकारते हैं. हमारे भारत देश में अनेक जातियाँ, धर्म-सम्प्रदाय हैं. कभी समय था कि सब अपनी जाति और अपने धर्म-सम्प्रदाय में रहते थे. एक-दूसरे को बुरा भला नहीं कहते थे. जिस जाति, धर्म, पंथ और सम्प्रदाय में जन्म हो गया उसी में जीवन गुजार देते थे मगर कलियुग में और विशेषकर स्वतन्त्रता के असली भाव को न समझते हुए इन जाति सम्प्रदायों में घृणा का भाव जागृत हो गया और एक-दूसरे को नीच, ऊँच, भला और बुरा कहना शुरू कर दिया जिससे ये विचार कि मैं कौन हूँ, कई जातियाँ के संबंध से उत्पन्न होने शुरू हो गए.

प्रत्येक जाति के साथ उसके कर्म का भी संबंध है. जिस प्रकार के किसी खास जाति के लोग कर्म करते हैं उसके प्रभाव से उस जाति का नाम रख दिया जाता था. जैसे चमड़े का काम करने वाली जाति को चमार, कपड़े धोने वाले को धोबी, लोहे का काम करने वाले को लोहार, लकड़ी का काम करने वाले को तरखान (बढ़ई), हजामत का काम करने वाले को नाई, खेती का काम करने वाले को किसान, कपड़ा बुनने वाले को जुलाहा, इसी तरह और भी जातियाँ हैं जो कर्म के आधार पर मशहूर हैं.
संस्कार का प्रभाव

तमाम जातियों के लोगों का सामाजिक जीवन स्तर एक जैसा होना चाहिए ताकि जन्म से ही अच्छे संस्कार मिलें और कोई भी अपने को दीन-हीन न समझे. संस्कार देने वाले अपने-अपने धर्मों के कार्यकर्ता और शिक्षक होने चाहिए. शिक्षा पद्धति ऐसी हो जिससे बचपन से ही एकता और राष्ट्रीयता के संस्कार मिलें. सबमें मानवता का भाव उत्पन्न हो जाए और सभी लोग प्रेमपूर्वक अपना जीवन गुजार सकें. शेष रह गया विवाह शादियों का. जब से सृष्टि बनी है तब से विवाह शादियों के तरीके बदलते आए हैं. पहले स्वयंवर रचाए जाते थे. लड़कियाँ स्वयं देखकर अपनी खुशी से वर चुन लेती थीं. उसके बाद एक समय आया जब लड़कियों को बलपूर्वक उठा कर ले जाते थे, जिस तरह अर्जुन और सुभद्रा का विवाह हुआ. उसके बाद शादियों का काम पुरोहितों के हाथ आ गया. फिर समय बदला. मातापिता अपने बच्चों की शादियाँ करते थे. पहले छोटी उम्र में शादी हो जाती थी, अब लड़की की शादी 18 वर्ष और लड़के की शादी 21 वर्ष से पहले नहीं की जा सकती. अब समय आ रहा है लड़कियाँ-लड़के आपस में प्यार मोहब्बत कर लेते हैं और शादियाँ हो जाती हैं. इसी तरह ऊपर लिखी कुरीतियों को भी छोड़ना चाहिए. समय के मुताबिक अपने आपको बदलना चाहिए.

 खास तौर पर जो लोग यह जानना चाहते हैं कि हम कौन हैं, उनके लिए पुराने पुस्तकीय इतिहास काम नहीं देते. सन्त कबीर जो महान सन्त हुए हैं उन्होंने एक शब्द लिखा हैः-

मेरा तेरा मनुआ कैसे इक होई रे।।

मैं कहता हौं आँखन देखी, तू कहता कागद की लेखी ।।

इसमें कबीर साहिब फरमाते हैं कि जो किताबों में लिखा हुआ है उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता.

मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे ।।

मैं वो बात कहता हूँ जिसे साक्षात्‌ देखकर पूरी शांति प्राप्त कर सकें और तुम किताबों में पढ़ कर वो बातें करते हो जिससे व्यर्थ उलझन पैदा हो जाए. किताबों में पढ़ कर कोई भी पूरे तौर पर शांति हासिल नहीं कर सकता.

मैं कहता तू जागत रहियो, तू रहता है सोई रे।

मैं कहता निर्मोही रहियो, तू जाता है मोही रे ।।

जुगन जुगन समझावत हारा, कही न मानत कोई रे।

तू तो रण्डी फिरे बिहण्डी, सब धन डारे खोई रे ।।

जो लोग किताबों में सच्ची बात या असलीयत की खोज करते हैं, वो अपना सब कुछ खो बैठते हैं. ऐसे लोगों को कबीर साहिब रण्डी और बिहण्डी कहते हैं:-

सतगुरु धारा निर्मल बाहै, वा में काया धोई रे।

कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे ।।

जिस वर्ण को तू जानने का इच्छुक है, उसका पता तो तब लगेगा जब जो शक्ल और वर्ण अपना समझ रखा है उसको धो डालेगा. हमें ये तरह-तरह के वर्ण मिलते हैं, इनको धारण करके, धर्म की राह पर चल कर, हम इन वर्णों को धो सकते हैं और असली वर्ण जान सकते हैं और सच्चा सुख और शांति प्राप्त कर सकते हैं.सुमरिन कर ले मेरे मना, तेरी बीती उमर हरिनाम बिना।

देह नैन बिन, रैन चन्द्र बिन, धरती मेघ बिना ।

जैसे तरुवर फल बिन होना, वैसा जन हरिनाम बिना।

कूप नीर बिन, धेनु क्षीर बिन, मन्दिर दीप बिना।

जैसे पंडित वेद विहीना, वैसा जन हरिनाम बिना ।।

काम क्रोध मद लोभ निवारो, छोड़ विरोध तुम संशय गुमाना।

नानक कहे सुनों भगवंता, इस जग में नहीं कोऊ अपना ।।

इन शब्दों में गुरु नानक देव जी ने मेघ की महिमा गाई है. धरती मेघ के बिना ऐसे ही है जैसे हमारा जीवन हरिनाम बिना निष्फल और अकारथ हो जाता है. इसमें और भी उदाहरण दिए हैं ताकि मेघ की महानता का पता लग सके. कबीर सहिब का भी कथन हैः-

तरुवर, सरवर, सन्तजन, चौथे बरसे मेंह।

परमारथ के कारणे, चारों धारें देह ।।

साध बड़े परमारथी, घन ज्यों बरसे आय,

तपन बुझावे और की, अपना पौरुष लाय ।।
जब इन्सान में मानवता आ जाती है तो उसके लक्षण संतों ने बहुत बताए हैं. परोपकार, सबको शांति, वाणी ठंडक देने वाली बन जाती है. धरती पर रहने वाले प्राणियों की तपन बुझ जाती है. इस विषय पर कबीर साहिब का एक शब्द है :-

अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बन्दे।

एक नूर से सब जग उपज्या, कौन भले को मंदे।

सबसे पहले शब्द ने ही प्रकाश अर्थात ब्रह्म को उत्पन्न किया और शब्द ब्रह्म की चेतन शक्ति से ये पाँचों तत्त्व बन जाते हैं और वो चेतन शक्ति ही इन सब तत्त्वों में विद्यमान है, तभी यह तत्त्व रचना कर सकते हैं.

लोगा भरम न भूलो भाई,

खालिक, ख़लक, ख़लक में खालिक, पूर रहयौ सब ठाई।

भ्रम में आकर यह नहीं भूलना चाहिए कि वो स्रष्टा और सृष्टि उत्पन्न करने वाला और उत्पत्ति सब एक ही वस्तु है. वेदों में भी लिखा है :-

‘एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति’

शास्त्रों में भी कहा है कि ब्रह्म एक चेतन शक्ति है, वो आप तो नज़र नहीं आती मगर उसके कारण यह दृश्यमान जगत बना है. इन सब में वही है. इस मेघ वर्ण का निर्माण भी उसी चेतन शक्ति से हुआ.

माटी एक अनेक भाँति कर साजी साजनहारे।

न कछु पोच माटी के भांडे, न कछु पोच कुम्हारे ।।

कुम्हार एक ही मिट्‌टी से कई प्रकार के बर्तन बना लेता है, है वो मिट्‌टी, मगर मिट्‌टी की शक़्लें बदल जाती हैं. मिट्‌टी कई नामों, रूपों में आ जाती है :-

सबमें सच्चा एको सोई, तिस का किया सब कुछ होई।

हुकम पछाने सो एको जाने बन्दा कहिये सोई ।।
सबमें वो शब्द ही काम कर रहा है उसी से सब कुछ बना है और वही सब कुछ करता है. जो उसको जान जाता है वही इन्सान है. हुक्म भी प्रकाश का ही नाम है क्योंकि परम तत्त्व से ही पहले शब्द पैदा होता है और शब्द से आगे फिर रचना शुरू हो जाती है इसी को हुक्म कहा गया है.

अल्लाह अलख नहीं जाई लखिया गुर गुड़ दीना मीठा।

कहि कबीर मेरी संका नासी सर्व निरंजन डीठा ।।

कबीर साहिब फरमाते हैं कि गुरु की दया से सब भ्रम और शंकाएँ समाप्त होते हैं और वो जो अलख था (शब्द को देखा नहीं जा सकता इसलिए उसे अलख कहा है), उसे कोई सत्गुरु ही लखा सकता है और फिर वो न नज़र आने वाला नजर आने लग जाता है.

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