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कावड यात्रा

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हर साल श्रावण मास में करोड़ो की तादाद में कांवडिये सुदूर स्थानों से आकर गंगा जल से भरी कांवड़ लेकर पदयात्रा करके अपने गांव वापस लौटते हैं इस यात्राको कांवड़ यात्रा बोला जाता है। श्रावण की चतुर्दशी के दिन उस गंगा जल से अपने निवास के आसपास शिव मंदिरों में शिव का अभिषेक किया जाता है। कहने को तो ये धार्मिक आयोजन भर है, लेकिन इसके सामाजिक सरोकार भी हैं। कांवड के माध्यम से जल की यात्रा का यह पर्व सृष्टि रूपी शिव की आराधना के लिए हैं। पानी आम आदमी के साथ साथ पेड पौधों, पशु - पक्षियों, धरती में निवास करने वाले हजारो लाखों तरह के कीडे-मकोडों और समूचे पर्यावरण के लिए बेहद आवश्यक वस्तु है। उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति को देखें तो यहां के मैदानी इलाकों में मानव जीवन नदियों पर ही आश्रित है। नदियों से दूर-दराज रहने वाले लोगों को पानी का संचय करके रखना पड़ता है। हालांकि मानसून काफी हद तक इनकी आवश्यकता की पूर्ति कर देता है तदापि कई बार मानसून का भी भरोसा नहीं होता है। ऐसे में बारहमासी नदियों का ही आसरा होता है। और इसके लिए सदियों से मानव अपने इंजीनियरिंग कौशल से नदियों का पूर्ण उपयोग करने ...

मानव कोन है

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मनुष्य इस संसार में आता है, उसके अन्दर स्वाभाविक ही यह जानने की इच्छा पैदा होती है कि वो क्या है, कहाँ से आया है, कहाँ जाएगा? इसी तरह हर व्यक्ति जो किसी भी जाति, धर्म, समाज, सम्प्रदाय, देश का हो, वो भी यह जानने के लिए विवश है कि मेरी जाति, धर्म, सम्प्रदाय क्या है, कैसे बनी? अपने आप को जानने से पहले इन बातों का ज्ञान आवश्यक है. इन बातों के ज्ञान के लिए प्रकट रूप में पता लगता है कि मुझे माता-पिता ने उत्पन्न किया और मेरा यह नाम है, यह जाति है, यह धर्म है. तो यह माता पिता बताते हैं, तेरा क्या नाम है, तू हमारा लड़का-लड़की है, किस जाति का है.। इसी क्रम में मुझे भी जीवन के प्रारम्भिक समय में ये ख्यालात आते थे कि मैं कौन हूँ? माता-पिता ने जितना हो सका बता दिया. मेरा नाम रखा. अब जो भी इस नाम से मुझे पुकारता है, मुझे यकीन हो गया है कि मैं मुन्शीराम हूँ. जाति का अपने माता-पिता से, समाज के लागों से यकीन हो गया कि मैं मेघ जाति का हूँ. इसके बाद वास्तव में मनुष्य क्या है, यह गुरु बताता है. गुरु की दया से यह पता चला जाता है कि इन्सान शरीर है या मन है या आत्मा है या इससे परे भी कोई हमारा अपना आप है. उस...

सभ्य समाज

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हम जिस समाज में रहते हैं उसका हमारे संस्कारों पर विशेष प्रभाव होता है। समय के साथ विचार ओर संस्कारों में बुराइयां घर कर जाती है।  हमे उनका अपनी क्षमता के अनुरूप विरोध करना चाहिए, वरना खुद पर अत्याचार के समान हो जाता है।  आज के समय में दहेज प्रथा ने बहुत विकराल रूप धारण कर लिया है जिसको संत रामपाल जी महाराज जी ने अपने ग्यान आधार से भक्ति विधि से जड़ से खत्म कर रहे हैं।  आज बुद्धिजीवी समाज संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा ग्रहण कर सत भक्ति करके अपना मानव जन्म सफल बना रहे हैं, जिससे समाज में एक नयी विचारधाराओं का विकास हो रहा है सुन्दर समाज का निर्माण हो रहा है 

सत भक्ति

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मनुष्य जीवन परमात्मा का अनमोल उपहार है, हमें मनुष्य को सफल बनाने के लिए मोक्ष मार्ग पर चलने का प्रयत्न करना चाहिए। जिसके लिए हमें तत्व ज्ञान की जरूरत पड़ती है।  गीता अध्याय 17 श्लोक 23 में वर्णन है कि हम पुर्ण परमात्मा की भक्ति करके सतलोक जा सकते हैं।  हमे तत्वदर्शी संत की खोज करके सत भक्ति करने से आत्माा का  मोक्ष संभव है। आज तत्वदर्शी संत के रुप में धरती पर पुर्ण परमात्मा कबीर साहिब संत रामपाल जी महाराज जी के रूप में धरती पर आए हुए हैं, उनसे शास्त्र अनुकूल साधना पाकर आत्माओं का मोक्ष सम्भव है। 

जैन धर्म में भगवान की परिभाषा

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जैन धर्म (जैन धर्म) में भगवान और तीर्थंकर की अवधारणा जैन धर्म (जैन धर्म) में भगवान और तीर्थंकर की अवधारणा  आध्यात्मिक नेता संत रामपाल जी सतलोक आश्रम जैन धर्म (जैन धर्म) में भगवान और तीर्थंकर की अवधारणा जब से आत्मा भगवान से अलग हुई है, वह बेचैन है और शाश्वत शांति की तलाश में भटक रही है। मानव जीवन कर्म (कर्म) के इर्द-गिर्द घूमता है। मनुष्यों द्वारा किए गए शुभ कर्म उसे / उसे मानव जीवन में सभी सुख और आनंद प्रदान करते हैं जबकि पापों के परिणामस्वरूप दुःख और दुःख होते हैं। हिंदू धर्म, जैन धर्म और बुद्ध धर्म के अनुयायी कर्मों में दृढ़ता से विश्वास करते हैं। आत्मा जन्म और पुनर्जन्म की पीड़ा से छुटकारा पाना चाहती है; इसलिए, मानव जन्म में आत्मा अपने शुभ कर्मों को बढ़ाने और पापों को कम करने के लिए विभिन्न धार्मिक प्रथाओं का पालन करती है। तथ्य यह है कि मानव जन्म सच्ची उपासना द्वारा मोक्ष प्राप्त करने के लिए प्राप्त किया जाता है जो कि शास्त्र आधारित है। अगर इस प्रमुख मकसद से ध्यान भटकाना है तो मानव का जन्म एक व्यापक अपव्यय है। बाकी, अन्य जीवन रूपों में सभी गतिविधियाँ भी कर रही हैं। परिवार के सद...

बौद्ध धर्म में भगवान की परिभाषा

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बुद्ध ने वास्तव में दिव्य जीवों के बारे में क्या कहा था? बौद्ध धर्म में देवत्व अनुयायी जो साम्यवाद की वकालत करते हैं बौद्ध किससे प्रार्थना करते हैं? पागलपन का अधिनियम: मानव बलिदान शुरुआत करने के लिए आइए जानते हैं कि बौद्ध धर्म की स्थापना किसने की थी? बौद्ध धर्म की स्थापना किसने की? बुद्ध, 2600 साल पहले, एक भारतीय दार्शनिक, धार्मिक शिक्षक और बौद्ध धर्म के ऐतिहासिक संस्थापक थे।  बुद्ध को शाक्यमुनि के रूप में भी जाना जाता था और कपिलवस्तु (अब नेपाल में) शहर के पास राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (563-483 ईसा पूर्व) के रूप में पैदा हुए थे। उनकी माँ, 'माया' की मृत्यु उनके जन्म के सात दिन बाद हुई। उनके पिता, 'शुद्धोधन' पाटलिपुत्र शहर के शासक थे; Asकयान वंश, शाक्यों के रूप में जाना जाने वाला एक गोत्र। उसके पास वह सब कुछ था जो जीवन प्रदान कर सकता था: भौतिक संपत्ति, एक प्रेमपूर्ण परिवार, प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और शक्ति। बाद में उसने ईश्वर की खोज में निकल पड़ा।   अपने शुरुआती वर्षों में बुद्ध के पिता ने उनकी रक्षा कैसे की? बुद्ध (सिद्धार्थ) के जन्म के तुरंत बाद, एक द्रष्टा ने भविष्यवाणी की ...

सृष्टि का विकास

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जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा। हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।। दुनिया को चलाने वाला एक ही अल्लाह परमात्मा गोड कबीर परमेश्वर एक ही के अनेक नाम है। वो सतलोक में सशरीर रहता है उसका नाम कविर्देव है । उस परमेश्वर ने छः दिन में सृष्टी की रचना की तथा सातवें दिन तख्त पर जा विराजा ।वह अविनाशी परमात्मा राजा के समान दर्शनीय है उन्होंने अपने ही समान मनुष्य की रचना की  हजरत ईसा जी ने जो चमत्कार किए वो तो पहले से ही निर्धारित कर्म थे। उन कर्म को तो सिर्फ़ पूर्ण परमात्मा ही बदल सकते हैं जिसका प्रमाण वेद भी देते हैं परमात्मा कबीर साहेब पाप विनाशक हैं यजुर्वेद अध्याय 8 मन्त्र 13 में कहा गया है कि परमात्मा पाप नष्ट कर सकता है। संत रामपाल जी महाराज जी से उपदेश लेने व मर्यादा में रहने वाले भक्त के पाप नष्ट हो जाते हैं। परमात्मा साकार है व सहशरीर है (प्रभु राजा के समान दर्शनीय है) यजुर्वेद अध्याय 5, मंत्र 1, 6, 8, यजुर्वेद अध्याय 1, मंत्र 15, यजुर्वेद अध्याय 7 मंत्र 39, ऋग्वेद मण्डल 1, सूक्त 31, मंत्र 17, ऋग्वेद मण्डल 9, सूक्त 86, मंत्र 26, 27, ऋ...